शिक्षा के मंदिर में हम बच्चों का चरित्र निर्माण करें! – डा. जगदीश गांधी

विद्यालय' में आकर बालक का चरित्र शिक्षकों के द्वारा 'क्लासरूम' में ही गढ़ा जाता है। जिस तरह एक कुशल शिल्पकार अनगढ़ पत्थर को गढ़कर उसे सुन्दर मूर्ति का रूप दे देता है। उसी प्रकार एक कुशल, चरित्रवान शिक्षक या गुरू भी बालक को गढ़कर उसे चरित्रवान इंसान बना सकता है। गुरू शब्द दो अक्षरों के योग से बनता है। 'गु' का अर्थ है अंधेरा और 'रू' का अर्थ है उस अन्धकार को दूर करने वाला। इस प्रकार गुरू का अर्थ हुआ 'अंधकार को दूर करने वाला। मनुष्य के अन्दर सद्गुणों और दुर्गुणों दोनों का ही संग्रह है। दुर्गुणों का त्याग एवं सद्गुणों का सर्वांगीण विकास करना ही गुरू या शिक्षक का उद्देश्य होना चाहिए। महर्षि श्री अरविंद के शब्दों में 'वही शिक्षा सच्ची व वास्तविक है जो व्यक्ति की अन्तर्निहित शक्तियों का विकास कर उसमें चारित्रिक गुणों को विकसित करके पूर्णता लाये, मानव जीवन को सफल बनाने में उसकी सहायता करें और जीवन तथा मानव जाति के मन तथा आत्मा की संपूर्णता की अभिव्यक्ति कर मनुष्य और राष्ट्र में सच्चा और अनिवार्य संबंध स्थापित करने में सहायक हो।' डा. कलाम की युवा पीढ़ी के लिए शपथ है – सदाचार से चरित्र निश्छल बनता है, निश्छल चरित्र से घर में मेलजोल रहता है, घर में मेलजोल से देश व्यवस्थित रहता है और व्यवस्थित राष्ट्र से विश्व में शांति रहती है