दिल्ली के तत्कालीन सुल्तान फिरोज शाह तुगलक ने पीपा महाराज पर आक्रमण कर दिया। महाराजश्री ने मुगलों से लोहा लेकर विजय हासिल की, लेकिन युद्ध में जमीन से जल तक के रक्तपात को देख उनका मन भक्ति की ओर उन्मुख हो गया।
एक सफल शासक के तौर पर युद्ध लड़ने और उसके बाद हमेशा से लिए राजगद्दी त्याग घर-घर जाकर लोगों की सोई हुई चेतना को फिर से जगाने में राजस्थान में सर्वप्रथम नाम महाराज श्री पीपीजी का है। उनके शासनकाल में दिल्ली के तत्कालीन सुल्तान फिरोज शाह तुगलक ने आक्रमण कर दिया। महाराज ने मुगलों से लोहा लेकर विजय हासिल की, लेकिन युद्ध में जमीन से जल तक के रक्तपात को देख उनका मन भक्ति की ओर उन्मुख हो गया। इसके बाद उन्होंने काशी जाकर स्वामी रामानंद शिष्यत्व ग्रहण किया। कठिन परीक्षा में सफल होकर वे स्वामी रामानंद के 12 प्रधान शिष्यों में स्थान पाकर संत कबीर के गुरुभाई बने।
- पीपाजी को निर्गुण भावधारा का संत कवि, समाज सुधार और विचारक-प्रचारक माना जाता है।
- राजस्थान में उन्होंने पाखंडों, आडंबरों के खिलाफ सीना तान खड़े होने में संत कबीर के साथ कंधे से कंधा मिलाया।
- कहा जाता है कि उन्होंने युद्धों से उलझते राजस्थान में भक्ति और समाज सुधार की अविरल धारा का प्रवाह किया था।
- संत बनने के बाद अपनी पत्नी सीता सहचरी के साथ राजस्थान के हर हिस्से में जाकर अलख जगाने का काम किया।
- वे कई भक्त मालाओं के आदर्श चरित्र पुरुष बनकर लोकवाणियों में गाए जाते हैं।
- उन्होंने दुनियाभर के संतों को राजस्थान के गागरोन में आने का न्यौता दिया था।
- स्वामी रामानन्द, संत कबीर, रैदास, धन्ना सहित अनेक संतों की मंडलियों ने पहली बार राजस्थान की धरा पर कदम रखा था। इसका परिणाम युद्ध और हमलों से जुझते राजस्थान में भक्ति और समाज सुधार की सरिता बहने लगी थी।
वीर, धीर और प्रजापालक शासक रहे महाराज
- झालावाड़ के पास आहू और कालीसिंध नदी के किनारे बना प्राचीन जलदुर्ग गागरोन संत पीपाजी की जन्म और शासन स्थली रहा है।
- यहीं सामने दोनों नदियों के संगम पर उनकी समाधि, भूगर्भीय साधना गुफा और मंदिर आज भी स्थित हैं।
- उनका जन्म 14वीं सदी के अंतिम दशकों में गागरोनगढ़ के खीची राजवंश में हुआ था।
- वे गागरोन राज्य के एक वीर, धीर और प्रजापालक शासक थे।
- उन्होंने संत बनने के बाद कपड़े खुद सिले थे, इसलिए पीपावंशी दर्जी समाज उन्हें अपना आराध्यदेव मानता है।